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अनुचित है इस कदम का विरोध
March 21, 2019 • ASHOK YADAV

अनुचित है इस कदम का विरोध

 

केन्द्र सरकार द्वारा पुलवामा हमले के बाद से कड़ा कदम उठाते हुए इस संगठन पर पांच साल से अधिक की सम्पत्ति है। जमात अपने इन्हीं गतिविधियों को लेकर कोई आरोप नहीं है और ही आतंकवाद पर नकेल कसने के लिए लगातार का प्रतिबंध लगाया गया है तो अलगाववादियों स्कूलों और मदरसों की आड़ में घाटी में अमन कहा जाता है कि यह देश में स्वास्थ्य और शिक्षा कड़े कदम उठाए जा रहे हैं। इसी कड़ी में पहले की भाषा बोलते रहे उमर अब्दुल्ला और महबूबा के दुश्मनों को तमाम सुविधाएं मुहैया कराता है। से जुड़े महत्वपूर्ण वेलफेयर कार्य करता रहा है। घाटी में अलगाववादी नेताओं से उनकी सुरक्षा सरीखे घाटी के शीर्ष नेताओं का इस फैसले के यह अलगाववादी संगठन हिजबुल मुजाहिद्दीन का 1953 में राजनीतिक विचारधारा में मतभेद के छीनने के बाद अब अलगाववादी संगठन जमात- विरोध में वही पुराना बेसुरा राग शुरू हो गया है। दाहिना हाथ माना जाता है और कटु सत्य यही है चलते जमात-ए-इस्लामी हिंद से अलग होकर ए-इस्लामी पर आतंकवाद निरोधक कानून के दरअसल इन लोगों की फितरत ही कुछ ऐसी हैकि जमात ने ही हिजबुल को पाल-पोसकर इतना एक संगठन बना श्जमात-ए-इस्लामी (जम्मू तहत 5 साल के लिए प्रतिबंध लगाया गया है। कि जब ये सत्ता में होते हैं तो इनके सुर कुछ और बड़ा किया है। यह हिजबुल मुजाहिद्दीन को कश्मीर), जिसने अपना अलग संविधान बनाया इससे पहले भी दशकों पहले दो बार इस संगठन होते हैं और सत्ता से बाहर होते ही ये रंगरूटों की भर्ती, उसके लिए फंड की व्यवस्था, और जिसकी घाटी की राजनीति अहम भूमिका को प्रतिबंधित किया गया था। पहली बार 1975 अलगाववादियों की भाषा बोलने लगते हैं। घाटी आश्रय और साजो-सामान इत्यादि हर प्रकार की रही है। वर्ष 1971 से इसने सक्रिय राजनीति में में जम्मू कश्मीर सरकार द्वारा इस पर दो साल का में आतंक का पर्याय बने पत्थरबाजों के पक्ष में मदद करता रहा है। हिजबुल मुजाहिद्दीन का प्रवेश किया। हालांकि पहले चुनाव में इसे एक प्रतिबंध लगाया गया था और दूसरी बार केन्द्र आवाज बुलंद करना, अलगाववादी नेताओं की सरगना सैयद सलाहुद्दीन है, जो कश्मीर के भी सीट हासिल नहीं हुई किन्तु उसके बाद इसने सरकार द्वारा 1990 में इसे प्रतिबंधित किया गया सुरक्षा वापस लिए जाने पर उसका विरोध करना पाकिस्तान में विलय का समर्थन करता रहा हैचुनावों में अच्छा प्रदर्शन कर प्रदेश की राजनीति था, जो दिसम्बर 1993 तक जारी रहा। यह और अब जमात-ए-इस्लामी सरीखे अलगावादी और हिजबुल पाकिस्तान के सहयोग से जमात- में खास जगह बनाई लेकिन धीरे-धीरे यह मुस्लिम ब्रदरहुड की तरह का ऐसा संगठन है, संगठन पर प्रतिबंध लगाए जाने पर उसकी ए-इस्लामी के कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण देने के अलगाववादी विचारधारा और आतंकवादी जिसका प्रमुख उद्देश्य राजनीति में भागीदारी करते मुखालफत करना, यही इनकी राजनीति का साथ ही उन्हें हथियारों की आपूर्ति भी करता रहा मानसिकता के प्रसार के लिए जिम्मेदार संगठन हुए राज्य में इस्लामी शासन की स्थापना करना वास्तविक घृणित चेहरा है। आज जरूरत तो इस 1990 में जब इस संगठन पर प्रतिबंध लगा, तब कार्य रहा है। हालांकि जमात-ए-इस्लामी द्वारा है। बता दें कि जमात-ए-इस्लामी के दक्षिण बनकर रह गया। इस संगठन का मानना है कि माना जाता है ।इस संगठन की करतूतों का काला बात की है कि महबूबा हों या उमर, वे घाटी के केन्द्र सरकार में गृहमंत्री महबूबा के पिता मुफ्ती घाटी में 400 स्कूल, 350 मस्जिद और एक कश्मीर क्षेत्र में बड़ी संख्या में कार्यकर्ता हैं। सीधे कश्मीर का विकास भारत के साथ रहकर नहीं हो चिऋ ऐसा है, जिससे यह आईने की तरह साफ भटके हुए नौजवानों को सही राह दिखाकर राष्ट्र मोहम्मद सईद थे जहां तक जमात-ए-इस्लामी हजार से अधिक मदरसे चलाए जा रहे हैं और शब्दों में कहा जाए तो इस संगठन के सकता और यह पिछले काफी समय से धरती के हो जाता है कि यह किस प्रकार हिन्दुस्तान के की मुख्यधारा से जोड़ने के प्रयास करें किन्तु ये पर प्रतिबंध की बात है तो गृह मंत्रालय के इसीलिए कट्टरवादी विचारधारा वाले कुछ लोगों कार्यकर्ताओं का एक बहुत बड़ा तबका हिजबुल स्वर्ग श्कश्मीरश् को पाकिस्तान में मिलाने की युवाओं को इस्लाम के नाम पर भड़काकर उन्हें जिस प्रकार अपने सियासी फयदे के लिए अनुसार यह राज्य में अलगाववादी विचारधारा द्वारा तर्क दिया जा रहा है कि इस संगठन पर मुजाहिद्दीन तथा कुछ अन्य आतंकी संगठनों के मुहिम चलाता रहा हैएक ओर जहां पूर्व श्जेहादश् के नाम पर अपने अलगाववादी मंसूबों आतंकवाद और अलगाववाद से जुड़े तत्वों का और आतंकवादी मानसिकता के प्रसार के लिए प्रतिबंध लगाने से इनमें पढ़ने वाले बच्चों का क्या लिए प्रत्यक्ष रूप से कार्य करता रहा है। अब यह मुख्यमंत्री और पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती तथा के लिए इस्तेमाल करता रहा है। यह तथ्य किसी समर्थन कर इन नौजवानों के मनोमस्तिष्क में प्रमुख रूप से जिम्मेदार रहा है, जिसे जमात-ए- होगा? यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि इन भी जान लेते हैं कि जमात-ए-इस्लामी का जन्म उमर अब्दुल्ला केन्द्र सरकार द्वारा जमात पर से छिपा नहीं है कि किस प्रकार यह बेरोजगार भारत विरोधी जहर भरते रहे हैं, ऐसे में अब इस्लामी (जम्मू कश्मीर) का मिलिटेंट विंग भी स्कूलों और मदरसों में बच्चों को कट्टरता का कब और कैसे हुआ था। वर्ष 1941 में इस्लामी प्रतिबंध लगाए जाने का पुरजोर विरोध करते हुए युवाओं के हाथों में बंदूकें थमाकर उन्हें घाटी में समय की मांग यही है कि घाटी में अमन-चौन माना जाता है। यह संगठन घाटी में आतंकवादी पाठ पढ़ाया जाता रहा है और घाटी में कार्यरत कई धर्मशास्त्री मौलाना अबुल अला मौदूदी द्वारा सरकार के फैसले की आलोचना कर रहे हैं, वहीं खूनखराबे के लिए उकसाता रहा है किन्तु दृढ़ की बहाली के लिए कोई भी कठोर फैसले लेते घटनाओं के लिए जिम्मेदार रहा है, जो आतंकी संगठन जमात के इन्हीं स्कूलों, मदरसों इस्लाम की विचारधारा को लेकर काम करने दूसरी ओर कड़वी सच्चाई यह है कि सऊदी राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में जमात-ए- समय उमर और महबूबा सरीखे ऐसे नेताओं को अलगाववादी और आतंकवादी तत्वों का और मस्जिदों में पनाह लेते रहे हैंजमात के इन वाले एक संगठन जमात-ए-इस्लामीश् का गठन अरब सहित कई मुस्लिम देशों में भी इस संगठन इस्लामी जैसे अलगाववादी संगठन दशकों से पूरी तरह दरकिनार किया जाए। हम यह कैसे वैचारिक समर्थन तथा उनकी राष्ट्र विरोधी स्कूलों, मदरसों और मस्जिदों को चलाने के लिए किया गया था लेकिन देश की आजादी के बाद पर प्रतिबंध है। अतरू यह बात समझ से परे हैइसी प्रकार राजनीतिक छत्रछाया में फलते-फूलते भूल सकते हैं कि 1975 में जमात-ए-इस्लामी गतिविधियों में उनकी हरसंभव मदद करता रहा पाकिस्तान, हुर्रियत कांफ्रेंस तथा बहुत से स्थानीय यह जमात-ए-इस्लामी पाकिस्तान और जमात- कि कुछ लोग इस संगठन पर भारत में भी हुए हमारे अमन-चौन के दुश्मन बने रहते हैं और पर प्रतिबंध लगाने वाले कोई और नहीं बल्कि है। घाटी में आतंकियों को शरण देना, प्रशिक्षित लोग चंदे के जरिये इसकी मदद करते रहे हैं और ए-इस्लामी हिंद में विभाजित हो गया। जमात- प्रतिबंध लगाए जाने का बेवजह विरोध क्यों कर हम कुछ नहीं कर पाते। अब जबकि सरकार द्वारा उमर अब्दुल्ला के दादा शेख अब्दुल्ला थे जबकि करना और उन्हें फंड मुहैया कराना इसका अहम फिलहाल इस संगठन के पास 4500 करोड़ रुपये ए-इस्लामी हिंद पर अभी तक राष्ट्र विरोधी रहे हैं?