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आखिर हम चिंतित क्यों नहीं होते
March 21, 2019 • ASHOK YADAV

आखिर हम चिंतित क्यों नहीं होते

 

प्रदूषण को लेकर एक के बाद एक रिपोटें आ रही धूल का उड़ना भी प्रदूषण की बड़ी वजह हैं। प्रदूषण को और उन्हें जैविक खाद बनाने का प्रशंसनीय कार्य प्रारंभ हैं, जिनमें भारत के शहरों की चिंताजनक स्थिति को लेकर सख्त नियम हैं, लेकिन उनको लागू करने वाला किया है। झारखंड के विश्व प्रसिद्ध बासुकीनाथ मंदिर के ओर इशारा किया जा रहा है। बावजूद इसके, हम इस कोई नहीं है। जनता से जुड़े इस विषय पर विस्तृत विमर्श ऐसे फ्लों और बेलपत्रों से दुमका जिला प्रशासन ने ओर आंख मूंदे हैं। कोई चिंता नहीं जतायी जा रही है। होना चाहिए, लेकिन ऐसा भी होता नजर नहीं आता है। श्बासुकीनाथश् अगरबत्ती बनाने का काम शुरू किया है। समाज में भी इसको लेकर कोई विमर्श नहीं हो रहा है। सोशल मीडिया पर रोजाना कितने घटिया लतीफे चलते इसके लिए वहां के गांव की महिलाओं को प्रशिक्षित कर अगले महीने आम चुनाव हैं, लेकिन उनमें भी यह कोई हैं, लेकिन पर्यावरण जागरूकता को लेकर संदेशों का उनका श्सखी मंडलश् नाम से ग्रुप तैयार किया गया है। मुद्दा नहीं है और न ही पर्यावरण संरक्षण किसी पार्टी के आदान-प्रदान नहीं होता है। टीवी चौनलों पर रोज शाम इससे जहां इन फूल-बेलपत्रों को इधर-उधर फेंक देने से घोषणापत्र में स्थान पाता है। आइक्यूएयर एयर विजुअल बहस होती है, लेकिन बढ़ते प्रदूषण पर कोई सार्थक पैदा होने वाली गंदगी की समस्या खत्म हो गयी, वहीं और ग्रीनपीस ने हाल में अध्ययन प्रकाशित किया है, चर्चा नहीं होती। वायु प्रदूषण के शिकार सबसे ज्यादा फूलों का उपयोग भी होने लगा है और गांव की जिसके अनुसार दुनिया के सबसे ज्यादा प्रदूषित 10 बच्चे और बुजुर्ग होते है। वायु प्रदूषण से हर वर्ष 70 महिलाओं को नियमित रोजगार मिला है। इस ग्रुप में शहरों में से सात भारत के हैं। इनमें पांच तो राष्ट्रीय लाख लोगों की जान चली जाती है, जिनमें छह लाख ज्यादातर महिलाएं आदिवासी हैं, जो इससे पहले राजधानी क्षेत्र दिल्ली के ही हैं। प्रदूषण स्तर के मामले में बच्चे हैं। दुनिया में औसतन सात में से एक बच्चा बदबूदार हड़िया (कच्ची शराब) बेच कर अपने घर टेकनोलॉजी का क्षेत्र का हब माने जाने वाला गुरुग्राम जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर है। कई वर्षों तक चलाती थीं। मंदिर में उपयोग के बाद फेंक दिये जाने प्रदूषण के मामले में दुनिया में टॉप पर है। रिपोर्ट के प्रदूषित हवा में सांस लेने के कारण कैंसर, हृदय और वाले फूल-बेलपत्रों से अब उनकी जिंदगी में खुशबू मुताबिक दूसरे नंबर पर गाजियाबाद है हरियाणा का श्वांस संबंधी बीमारियां हो जाती हैं और लोग अपनी जान आयी है। इस अगरबत्ती की सालों भर बिक्री होती है। फरीदाबाद चौथे, यूपी का नोएडा छठवें और राजधानी गंवा बैठते हैंपर्यावरण और मानवाधिकारों पर संयुक्त और जिला प्रशासन की पहल पर फिल्म निर्मातादिल्ली 11वें नंबर पर है। इस सूची में पटना सातवें नंबर राष्ट्र के विशेष दूत डेविड बॉयड का कहना है कि लोगों निर्देशक महेश भट्ट ने भी इसकी ब्रांडिंग की है। अन्य पर और मुजफ्फरपुर 13वें स्थान पर है। देश में प्रदूषण को स्वच्छ हवा में सांस लेने का बुनियादी अधिकार हैधर्म स्थलों को भी ऐसे उपाय अपनाने चाहिए। होता यह का स्तर कितना ज्यादा है, इसका अंदाजा इसी बात से और कोई भी समाज पर्यावरण की अनदेखी नहीं कर है कि हम लाखों-करोड़ों रुपये खर्च करके सुंदर मकान लगाया जा सकता है कि इस सूची में प्रदूषित शीर्ष 10 सकता है। दुनिया के 155 देश इस अधिकार को मान्यता तो बना लेते हैं, लेकिन नाली पर ध्यान नहीं देते और शहरों में से सात भारत के हैं। दुनियाभर के देशों की देते हैं। अपने देश में स्वच्छता और प्रदूषण का परिदृश्य गंदा पानी सड़क पर बहता रहता है। यही स्थिति कूड़े की राजधानियों से तुलना करें, तो भारत की राजधानी दिल्ली वर्षों से निराशाजनक है। इसको लेकर समाज में जैसी है। हम रास्ता चलते कूड़ा सड़क पर फेंक देते हैं। दलील सबसे ज्यादा प्रदूषित है। दिल्ली को लेकर लगातार रिपोटें चेतना होनी चाहिए, वैसी नहीं है। एक बात स्पष्ट है कि दी जाती है कि बिहार के शहरों के प्रदूषण की एक बड़ी आ रही हैं, लेकिन स्थिति जस-की-तस है। प्रदूषण के यह काम केवल केंद्र अथवा राज्य सरकार के बूते का वजह जनसंख्या घनत्व है, लेकिन दुनिया के कई ऐसे मामले में दिल्ली के बाद नंबर आता है बांग्लादेश की नहीं है। इसमें जनभागीदारी जरूरी है। केवल सरकार या शहर हैं जो उच्च जनघनत्व के बावजूद प्रदूषण की मुक्त राजधानी ढाका और अफगानिस्तान की राजधानी काबुल नगर निगमों के सहारे यह काम नहीं छोड़ा जा सकता है। हैं। सिंगापुर दुनिया का आठवां सबसे अधिक जन का। इससे पता चलता है कि आप किस श्रेणी में हैं। ये प्रदूषण मुख्य रूप से मानव निर्मित होता है। इसलिए घनत्व वाला शहर है, लेकिन अपने बेहतरीन आंकड़े किसी भी देश और समाज के लिए बेहद इसमें सुधार एक सामूहिक जिम्मेदारी है। साथ ही हमारी रखरखाव के कारण यह दुनिया का सबसे स्वच्छ शहर चिंताजनक हैं। सन् 2013 में दुनिया के 20 सबसे जनसंख्या जिस अनुपात में बढ़ रही है, उसके अनुपात में है। विदेशी शहरों को तो छोड़े अपने देश में ही देखें प्रदूषित शहर में चीन के पेइचिंग समेत 14 शहर शामिल सरकारी प्रयास हमेशा नाकाफ रहने वाले हैं। हमें प्रदूषण कि इस सूची में दक्षिण का कोई शहर शामिल नहीं थे, लेकिन चीन ने कड़े कदम उठाये और प्रदूषण की को नियंत्रित करने के प्रयासों में योगदान करना होगा। हैं। बिहार के शहरों के मुकाबले हैदराबाद, बेंगलुरु समस्या पर काबू पा लिया। दरअसल, विकास के नाम बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के हमारे अन्य अनेक जैसे शहर आबादी के लिहाज से बड़े हैं लेकिन पर औद्योगिक इकाइयों को धुआं फैलाने की खुली मिल शहरों की स्थिति भी कोई बहुत अच्छी नहीं है स्वच्छता योजनाबद्ध तरीके से विकास के कारण इन शहरों को जाती है। औद्योगिक इकाइयां, बिल्डर और खनन और सफई के काम को करने में सांस्कृतिक बाधाएं भी प्रदूषण की समस्या से जूझना नहीं पड़ रहा है। लोगों माफिया पर्यावरण संरक्षण कानूनों की खुलेआम अनदेखी आड़े आती हैं। देश में ज्यादातर धार्मिक स्थलों के में जब तक साफ सफई और प्रदूषण के प्रति चेतना करते हैं। औ करते हैं। औद्योगिक इकाइयों के अलावा वाहनों की आसपास अक्सर बहुत गंदगी दिखाई देती है। इन जगहों नहीं आयेगी, तब तक कोई उपाय कारगर साबित नहीं बढ़ती संख्या, धुआं छोड़ती पुरानी डीजल गाड़ियां, पर चढ़ाये गये फूलों के ढेर लगे होते हैं। कुछेक मंदिरों होंगे। यह चेतना सरकार और समाज को जागृत करनी निर्माण कार्य और टूटी सड़कों की वजह से भी हवा में ने स्वयंसेवी संस्थाओं की मदद से फूलों के निस्तारण होगी।