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इस युद्ध में मर्यादाहीनता के खतरे
May 19, 2019 • ASHOK YADAV

इस युद्ध में मर्यादाहीनता के खतरे

जब आप ये पंक्तियां पढ़ रहे हैं, 17वीं लोकसभा का चुनाव अंतिम चरण में पहुंच चुका है। विभिन्न दलों व संगठनों के आखिरी सांस तक हिम्मत न हारने वाले धुरंधर इसमें अकेले, मिलकर या कि गठजोड़ आदि बनाकर जीत-हार की प्रतिद्वंद्विता में शामिल हैं। उनके चुनाव प्रचार पर नजर डालें तो देखकर निराशा होती हैकि जैसे-जैसे चुनाव उतार पर आ रहा है, प्रचार का स्तर गिरता जा रहा है। उनमें शायद ही कोई इसे लेकर चिंतित हो कि चुनाव में लोकतंत्र के मूल्यों की रक्षा कैसे हो? यही कारण है कि राजनीतिक विरोधियों के काले इतिहास और कारनामों वगैरह को लेकर किये जा रहे वैयक्तिक हमले तेज होते जा रहे हैं। देश की अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दे और विकास की बातें तो जैसे इस चुनाव में हवा हो गई हैं। अलबत्ता, जातिवाद व साम्प्रदायिकता अथवा उनके जैसे ऐसे अन्य तत्वों को लेकर विमर्श किये जा रहे हैं, जिन्हें पहले के चुनावों में भी अनुपयुक्त या दोष मानकर रोकने की बात की जाती रही है। दूसरी ओर अब बड़े-बड़े नेता भी बार- बार बताते घूम रहे हैं कि उनके विरोधियों ने उन्हें किस प्रकार की और कितनी-कितनी गालियां दी हैं। प्रधानमंत्री तक कह रहे हैं कि उनके खिलाफ 56 ऐसे शब्दों का प्रयोग किया गया है, जो पद के साथ व्यक्ति की भी गरिमा गिराने और प्रतिष्ठा धूमिल करने वाले माने जाते हैं। इस चुनाव में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का नाम भी घूसखोरों, लुटेरों और सत्ता का दुरूपयोग करने वालों में लिया जा रहा है। भले ही उन्हें भारतरत्नश् जैसा देश का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान मिल चुका हो, उन्होंने चुनावी सभा को सम्बोधित करते समय हुए आतंकवादी मानव बम हमले में अपनी जान दी हो और लोग उन्हें शहीद कहते हों। जनसमर्थन की दृष्टि से देखा जाये तो भी कांग्रेस ने 1984 के लोकसभा चुनाव में उनके नेतृत्व में रेकार्ड संख्या में सीटें जीती थीं और अभी तक किसी भी दल के लिए उस रेकार्ड को छूना तक संभव नहीं हुआ है। सवाल है कि जिन राजीव गांधी ने देश की राजनीति में इतने उल्लेखनीय योगदान के बाद इस तरह अपना जीवन खोया, चुनावी स्वार्थों की सिद्धि के लिए उनके खिलाफघृणा व द्वेष फैलाना क्या लोकतांत्रिक मर्यादाओं के अनुकूल है? आखिरकार, हर चुनाव में एक आचार संहिता होती है, जिसका पालन कराना चुनाव आयोग का दायित्व है। लेकिन दुर्भाग्य से देश का यह संवैधानिक संस्थान भी आलोचनाओं से मुक्त नहीं रह गया है। अगर इस प्रवृत्ति को नई परम्पराओं की स्थापना करने के प्रयत्न के रूप में देखा जाये तो अनुमान लगाया जा सकता है कि भावी समाज की दिशा और लक्ष्य क्या होंगे? यहां यह तर्क दिया जा सकता है कि सत्ता के लिए तो सदैव ही मार- काट और हिंसा हुई है और जो उसमें विजय पाने वाला ही भावी व्यवस्था का संचालक बनता रहा है। लेकिन लोकतंत्र को तो इससे मुक्त माना जाता है क्योंकि इसमें हिंसक तरीकों से परहेज किया जाता है और गुणों व मर्यादाओं की स्थापना को ही उद्देश्य माना जाता है, दुर्मुख नेता मुंह खोलते हैं तो उनका यह संदेश प्रसारित जिससे आने वाली पीढियों व समाजों को भी प्रेरणा हो जाता है कि वे इतने धाकड़ हैं कि अपने शब्दबाणों जब आप ये पंक्तियां पढ़ रहे हैं, 17वीं लोकसभा मिले। दूसरे पहलू पर जायें और संसद के स्वरूप की से ही विपक्षी का भेदन कर सकते हैं। यह मानसिकता का चुनाव अंतिम चरण में पहुंच चुका है। विभिन्न दलों ओर निहारें तो सबसे बड़ी विडम्बना यह दिखाई देती अपनी स्वीकार्यता का विस्तार करती जायेगी तो क्या व संगठनों के आखिरी सांस तक हिम्मत न हारने वाले है कि भले ही हमारे लोकतंत्र के आधे से अधिक संवैधानिक मर्यादाओं के प्रति निष्ठा की वह शपथ धुरंधर इसमें अकेले, मिलकर या कि गठजोड़ आदि निवासी गरीबी की सीमा से नीचे रहते हों, उनकी संसद निर्दोष बन पायेगी, जिसे दिलाकर महत्वपूर्ण पदों की बनाकर जीत-हार की प्रतिद्वंद्विता में शामिल हैं। उनके में करोड़पतियों व अपराधियों का अनुपात निरंतर बढ़ता जिम्मेदारी निभाई जाती है?अपने दलों व समूहों के चुनाव प्रचार पर नजर डालें तो देखकर निराशा होती हैही जा रहा है। संविधान में सांसदों के निर्वाचन के लिए शीर्ष पर बैठे और उनका प्रतिनिधित्व करने वाले कि जैसे-जैसे चुनाव उतार पर आ रहा है, प्रचार का जिन अयोग्यताओं का वर्णन किया गया है, उनमें नेताओं के गुणों व मर्यादाओं के बजाय अपशब्दों को स्तर गिरता जा रहा है। उनमें शायद ही कोई इसे लेकर अनुचित साधनों से सम्पत्ति के अर्जन को भले ही प्रतिष्ठित करने पर आमादा होने से साफ है कि भावी चिंतित हो कि चुनाव में लोकतंत्र के मूल्यों की रक्षा अनैतिक बताया गया हो, सम्पत्ति को अवगुण नहीं माना समाज-रचना के अपने उपक्रमों में वे साध्य व साधनों कैसे हो? यही कारण है कि राजनीतिक विरोधियों के गया है। अमीरों के साथ संसद में अपराधियों की दोनों की शुचिता के हिमायती नहीं हैं। इससे होने वाली काले इतिहास और कारनामों वगैरह को लेकर किये जा संख्या भी बढ़ती जा रही है और इसे रोकने के दावे व मर्यादाओं की हानि को तो वे लोग ही देख पा रहे हैं, रहे वैयक्तिक हमले तेज होते जा रहे हैं। देश की उपाय निरर्थक सिद्ध हो रहे हैं। अपराधों के जन्म व जो मानते हैं कि लोकतंत्र के ऐसे नायकों के हाथों में अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दे और विकास की बातें तो जैसे चुनाव में उनके नेतृत्व में रेकार्ड संख्या में सीटें जीती विस्तार में शिक्षा प्रणाली और औद्योगीकरण दोनों को अपना भविष्य सौंपने का अंजाम क्या हो सकता है? इस चुनाव में हवा हो गई हैं। अलबत्ता, जातिवाद व थीं और अभी तक किसी भी दल के लिए उस रेकार्ड भूमिका है, जबकि हम इन दोनों के बगैर सतत विकास स्वाभाविक ही वे पूछते हैं कि कहीं ये नायक हमें साम्प्रदायिकता अथवा उनके जैसे ऐसे अन्य तत्वों को को छूना तक संभव नहीं हुआ है। सवाल है कि जिन की कल्पना भी नहीं कर पाते । गुणों और मर्यादाओं के सभ्यता व संस्कृति को अग्राह्य व अवगुण के रूप में लेकर विमर्श किये जा रहे हैं, जिन्हें पहले के चुनावों राजीव गांधी ने देश की राजनीति में इतने उल्लेखनीय लिए शिक्षा की अनिवार्यता को तो खैर सभी स्वीकार लेने को मजबूर तो नहीं करने वाले चुनाव लोकतंत्र में भी अनुपयुक्त या दोष मानकर रोकने की बात की योगदान के बाद इस तरह अपना जीवन खोया, चुनावी करते हैंराजनीतिक दलों का आचरण इसके विपरीत का युद्धकाल है तो मर्यादाहीन युद्ध उसे मजबूत नहीं जाती रही है। दूसरी ओर अब बड़े-बड़े नेता भी बार- स्वार्थों की सिद्धि के लिए उनके खिलाफघृणा व द्वेष भले ही हो, वे इन दोनों में वृद्धि को ही देश व समाज कमजोर ही कर सकता है। ऐसे में राजनीतिक दलों की बार बताते घूम रहे हैं कि उनके विरोधियों ने उन्हें किस फैलाना क्या लोकतांत्रिक मर्यादाओं के अनुकूल है? के विकास का द्योतक बताते हैं। जहां तक व्यक्तियों जिम्मेदारी है कि वे न सिर्फ मर्यादाएं निर्धारित करें प्रकार की और कितनी-कितनी गालियां दी हैं। आखिरकार, हर चुनाव में एक आचार संहिता होती है, द्वारा, वे नेता हों या कोई और, बोली जाने वाली बल्कि उनकी रक्षा के लिए अपने को समर्पित भी करेंप्रधानमंत्री तक कह रहे हैं कि उनके खिलाफ 56 ऐसे जिसका पालन कराना चुनाव आयोग का दायित्व है। भाषाओं का सम्बन्ध है, वे अपने समाज के स्वरूप व लेकिन अफसोस कि लोकतंत्र के इस युद्ध में आदर्श शब्दों का प्रयोग किया गया है, जो पद के साथ व्यक्ति लेकिन दुर्भाग्य से देश का यह संवैधानिक संस्थान भी नैतिकताओं को भी प्रदर्शित करती है। ऐसे में अगर नायक की खोज करते हुए अवधी के अपने वक्त के की भी गरिमा गिराने और प्रतिष्ठा धूमिल करने वाले आलोचनाओं से मुक्त नहीं रह गया है। अगर इस प्रवृत्ति नेताओं की भाषा उनके दुर्गुण के रूप में देखी जा रही महत्वपूर्ण कवि चन्द्रभूषण द्विवेदी रमई काकाश् की यह माने जाते हैं। इस चुनाव में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को नई परम्पराओं की स्थापना करने के प्रयत्न के रूप है तो जाहिर है कि इससे समाज के सांस्कृतिक स्वरूप कविता पंक्ति ही याद आती है, हम पूंछ उठावा देख का नाम भी घूसखोरों, लुटेरों और सत्ता का दुरूपयोग में देखा जाये तो अनुमान लगाया जा सकता है कि भावी में होने वाली गिरावट प्रदर्शित होती है। लेकिन क्या लिया, सारे जग में... निष्कर्ष यह कि हमें अपने करने वालों में लिया जा रहा है। भले ही उन्हें समाज की दिशा और लक्ष्य क्या होंगे? यहां यह तर्क नेताओं द्वारा अपनी शक्ति के प्रदर्शन में भाषाओं का लोकतंत्र को इस तरह के दुर्गुणों से बचाना है तो ऐसे भारतरत्नश् जैसा देश का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान दिया जा सकता है कि सत्ता के लिए तो सदैव ही मार- दुरुपयोग यह भी नहीं दिखाता कि लक्षित जनता उसे उपाय करने होंगे कि हमारे आज के राजनीतिक नायकों मिल चुका हो, उन्होंने चुनावी सभा को सम्बोधित करते काट और हिंसा हुई है और जो उसमें विजय पाने वाला पसन्द कर रही है? क्या इससे यह भी पता नहीं चलता को भी इनके नुकसानों का अहसास हो। लेकिन अभी समय हुए आतंकवादी मानव बम हमले में अपनी जान ही भावी व्यवस्था का संचालक बनता रहा है। लेकिन कि उसे ऐसी मानसिकता के हवाले कर दिया गया है, तो वे इन गालियों का अपने विरोधियों को परास्त करने दी हो और लोग उन्हें शहीद कहते हों। जनसमर्थन की लोकतंत्र को तो इससे मुक्त माना जाता है क्योंकि इसमें जिसमें तमीज या कि सभ्यता के बजाय बदतमीजी के लिए अस्त्र के रूप में प्रयोग करके ही खुश हो रहे दृष्टि से देखा जाये तो भी कांग्रेस ने 1984 के लोकसभा हिंसक तरीकों से परहेज किया जाता है और गुणों व जैसा दुर्गुण ही अधिक कारगर लगता है? तभी तो हैं। साध्य व साधनों इससे होने वाली देख पा रहे हैं.