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भारत के लिए सतर्क रहना बुद्धिमानी
April 14, 2019 • ASHOK YADAV

भारत के लिए सतर्क रहना बुद्धिमानी

 

 

इधर पूरे देश का ध्यान लोकसभा चुनावों की भारतीय राजनयिकों द्वारा इस अहं के आहत होने से हाल के वर्षों में यह देश भारत के लिए सैनिक हलचल ने, उनके शोर-शराबे ने अपनी तरफआकर्षित ही वह भारत से खिन्न होने लगे। मोहम्मद नशीद के साजो-सामान की खरीद का प्रमुख स्रोत बनकर कर रखा है, शायद इसलिए दूसरे देशों के चुनावों की पहले एक दशक तक अब्दुल गय्यूम ने मालदीव में प्रकट हुआ है और सीमांती तकनीक तथा वैज्ञानिक चर्चा वैसी नहीं हुई है, जैसी होनी चाहिए. पहले निर्वाचित तानाशाह के रूप में राज कियावह यामीन शोध में भी हमारा सामरिक साझेदार है। हम दोनों जिक्र मालदीव का- हजार से ज्यादा नन्हे टापुओं का के रिश्तेदार भी थे, पर इसके बावजूद वह कारावास देशों की खुफिया एजेंसियों के बीच जानकारी का समूह, जिसे दुनिया के गिने-चुने सूक्ष्म राज्यों में जाने से बच नहीं सके। बहरहाल जब गय्यूम के आदान-प्रदान कट्टरपंथी इस्लामी दहशतगर्दो का शुमार किया जाता है, कहने को भले ही यह माइक्रो खिलाफ फैज की एक टुकड़ी ने बगावत की, तब मुकाबला करने में उपयोगी साबित हुआ है। जब से स्टेट संसार के मानचित्र पर सूई की नोक से दर्शाया भारतीय कमांडो की कुमुक ने ही उनकी गद्दी बचायी मोदी ने प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला है, जा सकता है, हिंद महासागर में अपनी थी। तभी से गय्यूम के मन में यह आशंका घर कर इस्राइल की अहमियत लगातार बढ़ी हैइसका एक अतिसंवेदनशील भू-राजनीतिक स्थिति के कारण गयी कि भारत पर अपनी निर्भरता घटाने में ही भलाई कारण अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का इस्राइल की पीठ पर इसका महत्व हमारे लिए चीन या पाकिस्तान से कम है अन्यथा वह कभी भी हस्तक्षेप कर सकता है। वरदहस्त है। ईरान की नाक में नकेल कसने के लिए नहीं, हकीकत यह है कि ये दोनों देश मालदीव का इसलिए उन्होंने चीन तथा पाकिस्तान से घनिष्टता अमेरिका इसी मोहरे का प्रयोग करता रहा है। दिक्कत दुरुपयोग हाल के वर्षों में हमारी पीठ में खंजर बढ़ायी। इस काम को यामीन ने अंजाम तक पहुंचा सिर्फ यह है कि इस्राइल के नजदीक जाने के चक्कर भोंकनेवाले अंदाज में करते रहे हैं. करीब पांच-छह दिया।भारत की कोई इच्छा अपने किसी भी पड़ोसी में भारत अपने पारंपरिक मित्रों-ईरान, फिलिस्तीन, साल पहले जनतांत्रिक प्रणाली से निर्वाचित राष्ट्रपति देश के आंतरिक मामलों में दखलंदाजी की नहीं है, लेबनान से दूर होता जा रहा है। पश्चिम एशिया की का तख्ता पलटकर अब्दुल्ला यामीन ने सत्ता ग्रहण की पर निश्चय ही वह इनकी भूमि का दुरुपयोग अपने अंतरराष्ट्रीय राजनीति बहुत अस्थिर है। वहां शक्तिथी. आरंभ से ही उनका रवैया भारत विरोधी विरुद्ध करने की साजिश को नजरंदाज नहीं कर समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। सऊदी अरब आज था.उन्होंने चीन का तुरुप पत्ता खेलने की रणनीति सकता। हाल के वर्षों में यह संकट निरंतर बढ़ा है। सर्वशक्तिमान संपन्न सर्वप्रमुख नहीं। सीरिया में ईरान, अपनायी, साथ ही मालदीव की सुन्नी मुसलमान रईसों की ऐशगाह समझा जानेवाला मालदीव लेबनान तथा रूस की स्थिति अमेरिका के बहुसंख्यक आबादी का विज्ञापन कर पाकिस्तान तथा दहशतगर्दो का शरण्य भी बन गया है। सरकार ने हिमायतियों से कहीं बेहतर है, इस्लामी खिलाफ्त को सऊदी अरब जैसे समानधर्मा देशों से सहानुभूति तथा स्वयं इस्लामी कट्टरपंथ को प्रोत्साहित किया, साथ ही हराने का सेहरा इन्हीं के सर बांधा जा रहा सहायता बटोरने का प्रयास किया। इसी के चलते वह दुर्गम दूरदराज द्वीपों पर तस्करों की गतिविधियों को है इस्राइल की बड़ी चिंता गोलान ऊंचाइयों पर बैरी चीन के जाल में फंसते चला गया और मालदीव जड़ से समाप्त करने का कोई प्रयास नहीं किया गया। सेनाओं का कब्जा है। नेतन्याहू दक्षिणपंथी ही नहीं, की प्रभुसत्ता के लिए संकट पैदा हो गया। आर्थिक कुल मिलाकर मालदीव की संसद के चुनावों में कट्टर फिलिस्तीन विरोधी भी हैंउनका बस चले तो सहायता की एवज में चीन को मालदीव की भूमि पर नशीद के दल की निर्णायक विजय भारत के लिए वह फिलिस्तीनी शरणार्थियों वाले इलाके का विलय लगभग संप्रभु अधिकार सौंप दिये गये और चीनी संतोष का विषय है। हालांकि, कुछ ही महीने पहले ही कर डालें। जेरूसलम में राजधानी के स्थानांतरण कंपनियां दैत्याकार ठेकों के आधार पर बुनियादी राष्ट्रपति चुनावों में भी यामीन को नाटकीय हार का से उन्होंने निश्चय ही फिलिस्तीनियों को उकसाने का ढांचे के निर्माण में जुट गयीं। जाहिर है, चीन को मुंह देखना पड़ा था। पर इससे यह नतीजा निकालने प्रयास किया। भारत ट्रंप के दबाव में भी इस्राइल खुश करने के लिए भारतीय कंपनियों के ठेके-सौदे की जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए कि अब भारत के के हर गलत फैसले का समर्थन नहीं कर सकता। रद्द कर दिये गये। भारतीय राजदूत को अवांछित राष्ट्रहित यहां निरापद हैं। चीन और पाकिस्तान इतनी वैसे यह स्वीकार करना पड़ेगा कि इस्राइल की कोई व्यक्ति घोषित करने की देर बची थी। अक्सर उनकी आसानी से हार माननेवाले नहींदोनों के लिए ऐसी अपेक्षा हमसे नहींवह इसी में संतुष्ट है कि स्थिति नजरबंद कैदी सरीखी रहती थी। प्राकृतिक जनतांत्रिक चुनाव गौण है और उनके हथकंडे परदे हम उसके सामरिक साझेदार बन चुके हैं। भारत के आपदा प्रबंधन के लिए भारत ने जो दो हेलीकॉप्टर के पीछे जारी रहेंगे। फिलहाल नयी सरकार चीन के लिए यह याद रखना उपयोगी रहेगा कि चुनाव सुलभ कराये थे, उनके बारे में सैनिक दखलंदाजी का साथ सौदों को उतनी आसानी से खारिज नहीं कर जीतने के बावजूद नेतन्याहू भ्रष्टाचार के गंभीर दुष्प्रचार किया गया। मालदीव के सदियों पुराने रिश्ते सकती, जितनी आसानी से यामीन ने भारत को आरोपों से बरी नहीं हुए हैंउनकी जीत से इस्राइली अरब जगत से हैं- इस्लाम भी वहां भारत के रास्ते ठुकराया था। भारत के लिए सतर्क रहना ही समाज का विभाजन, पीढ़ीगत संघर्ष या राजनीतिक नहीं, समुद्री सौदागरों के माध्यम से ही पहुंचा। बुद्धिमानी है कुछ ऐसी ही स्थिति इस्राइल में असंतोष समाप्त होनेवाला नहीं। उनके प्रतिपक्षी गैंट्ज़ मालदीववासी अपने प्राचीन इतिहास पर गर्व करते हैंबेंजामिन नेतन्याहू की पांचवीं लगातार जीत ने भी की पार्टी बहुत पीछे नहीं है, इसलिए यह चुनौती बरकरार तथा इसे अपनी अलग पहचान का हिस्सा मानते हैं। भारत के लिए जटिल चुनौती के रूप में पेश की है। रहेगी।