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लत्ता लपेटी के दिन आखिर
April 26, 2019 • ASHOK YADAV

लत्ता लपेटी के दिन आखिर

बुरा वक्त आप कहते किसे हैं? क्या-क्या देखेंगे ओर कितने पतन की पराकाष्ठाओं तक पहुंचेंगे हां, सुरेन्द्र इश्लेष लेख के दो शेर देखेंइस मुक्कदस वक्त की कुछ खूबियां हैं, आदमी की आदमी से दूरियां हैं (जिन्दगी की दौड़ में शामिल हुए हम, और हासिल हुआ क्या, मायूसियां हैं। अखबार, टीवी, न्यूज चौनल और सामान्य बातचीत का गिरता हुआ स्तर- क्या हमारी नारों से ओझल हो सकता है। भाषा तो गई गुजरी चीज हो गई है। उसकी गिरावट देखकर अजीब भय होता है। सत्ता के पाले में बैठा मीडिया लगातार बक-बक कर रहा है। सामान्य आदमी को महामूर्ख समझते हुए सत्ता के ज्ञान का भाषण छांट रहा है। उसकी विश्वसनीयता पहले ही खारिज हो चुकी है, तभी तो कोई भी समझदार आदमी टीवी को देखने के लिए आतुर नहीं होता। चौनलों में सत्ता वाचकों को, उनकी मंशा को देखेंगे तो आपको लज्जा के सभी आवरण उतरते हुए दिखाई पड़ेंगे। हां, कुछ अपवादों को छोड़ दीजिए तब भी इतनी गिरावट के बावजूद, सत्ता की इतनी भडैती के बावजूद- कुछ तो है जो बार-बार जनता के इंजलास में आ ही जाता है। संवैधानिक संस्थाओं को धो-पोंछ डालने के बाद आयकर विभाग को इस चुनावी माहौल में उखाड़-पछाड़ करना था। भाई ये कार्रवाई पहले क्यों नहीं की? चुनाव आयोग की नाराजगी से क्या होता है। सब सत्ता की सहमति से हो रहा है। राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रद्रोह का खेल कब से चल रहा है। सत्ता को यह खेल खेले बिना चौन की नींद नहीं आती। जैसे पाकिस्तान को भारत का विरोध किए बिना, कुछ गोली बारी के बिना, आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम दिए बिना खाना हजम नहीं होता। हमारे सत्ता पुरुष भी इस कामकाज में ठेके से लगे हैं। जनता को दिखाना है कि हम उसके पक्ष में हैं। क्या पहले के लोग पक्ष में नहीं होते थे? जो सत्ता के पक्ष में बोले उसकी आरती उतारे वही राष्ट्र भक्त या देशभक्त। जो सत्ता के गलत क्रियाकलापों पर उंगली उठाए वह राष्ट्रद्रोही- यहां तक कि पाकपरस्त। क्या बेहतर तरीके से सत्ता की ट्रेनिंग चल रही है और सत्ता की देशभक्ति का नगाड़ा बज रहा है। हमारे देश में बलात्कार कोई मुद्दा नहीं श्मॉब लिंचिगशु की कोई कीमत नहीं। अपने सीनियरों की इज्जत उतारने से कोई परहेज नहीं। यह बिना किसी सोच-समझ के हो रहा है। जिनको संदर्भ प्रसंग तलाशना हो वे तलाशे। यह हमारी संस्कृति की खूबी ही है, कि बुजुर्गों का बंटाढार कियाजाए। जाहिर है कि एक तरह की गरज संस्कृति को इधर विकसित कियाजा रहा है। कौन कब गरजने लगे। ऐसा लगने लगता है कि कुछ तो मात्र गरजने के लिए ही बने हैं। बरसने की या जनता के कार्य करने की उनको कोई ख्वाहिश नहीं है। बदलाव की कोई चिंता नहीं, जनकल्याण की कोई भावना नहीं। भारत के प्रधान सेवक गरज रहे हैं। मन की बातें उड़ेल रहेहैं। उत्तरप्रदेश के मुखिया गरज रहे हैं। अब तो चुनाव के वक्त सुश्री मेनका गांधी भी गरज रही हैं। धमका रही हैं- मुस्लिम वोट दें नहीं तो सोचना पड़ेगा। केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह गरजते-गरजते थक गए। वे अभी अपने चुनाव क्षेत्र बेगूसराय में सांस रोके हवा का रुख देख रहे हैं। उन्हें विश्वास है कि कन्हैया कुमार को हमने इतना बदनाम कर दिया था, इतना राष्ट्रद्रोही बना दिया था, तो उसकी तो पुंगी बज के ही रहेगी। सुश्री स्मृति ईरानी फि अपने फर्म में हैं, क्योंकि मंत्री भी कभी ग्रेजुएट थी। पिछले बार के चुनाव में वे ग्रेजुएशन पास थी और अब बारहवीं में उतर आईं हैं। झूठ हमको कहां से कहां पहुंचा सकता है? निरंतर नए-नए रंग छा रहे हैं। सुश्री सुमित्रा महाजन पूर्व के लालकृष्ण आडवानी की तरह प्रमोट होकर सत्ता पार्टी के दर्शकमंडल में विराजित हो गई हैं। यह हमारा देश है और यह हमारा जनतंत्र है। यहां किसी के विरोध से कोई फर्क नहीं पड़ता। सेना के पूर्व अधिकारी विरोध कर रहे हैं, लेकिन सेना के नौजवानों का इस्तेमाल सत्ता पार्टी अपनी हेकड़ी दिखाने और चुनाव जीतने के लिए कर रही है। जय हो प्रजातंत्र की। जय हो आजादी की और जय हो सत्ता के भारी-भरकम ज्ञान की। कुछ माह पूर्व हमने अतिउत्सााहियों द्वारा महात्मा गांधी की फेटो लगाकर उन्हें मारने का जोरदार कार्य देखा। उनको शूट करते हुए देखा था। शायद यह भी कोई मुद्दा नहीं है और यह सत्ता के बस की बात भी नहीं है। बार-बार सामाजिक असमानता को खत्म करने की ख्वाहिश, सहिष्णुता को तार-तार देखना अब तो आम बात है। अब तो सब कुछ आम हो चला है। सवाल है कि कौन कितना झूठ बोल सकता है? इसके तमाम रिकॉर्ड हमारे देश में छाए हुए हैं। विरोध करने वालों पर तरह-तरह के मुकदमे ठोकना सत्ता के बाएं हाथ का खेल है। एक-एक कर पार्टियों में भगदड़ मची है। किसी ने कहा यह भगदड़ नहीं हुड़दंग है। श्रीमती कृष्णा तीरथ भाजपा से भागकर फिर कांग्रेस में। यह तो एक तरह का निरंतर खेल है। चुनाव के लिए चंदे की रकम पारदर्शी हो । पारदर्शी होगी तो सबको दिखाई पड़ेगा। यह भी पता चलेगा कि कितना कालाधन सफेद हो रहा है। चुनाव आयोग चुप्पी साधे बैठा है। कहता है कि बाद में हिसाब लेंगे। वह सत्ता को जिता रहा है। कोई भी कालिया जो धनाढ्य है अपनी रकम के बल पर सत्ता को अपने लिए झुका लेगा। अब तो राजनीतिक शुचिता गई तेल लेने। चौकीदार तो कभी झूठ ही नहीं बोलता और बोलता है तो किसी को सुनाई नहीं पड़ता। वह झूठ के महान पहाड़खड़ा कर देता है। देश की आजादी स्वाहा हो जाए, जनतंत्र हिंसातंत्र में और तानाशाही में बदल जाए क्या फर्क पड़ता है। राष्ट्रभक्ति का ठप्पा लगा हो तो सारी चीजें माफ हो सकती हैं। मेरे एक मित्र कह रहे थे कि प्रश्न पीछे पड़े हैं उत्तरों से हम डरे हैं। यह हमारे लत्ता-लपेटी के दिन हैं। ये बरसने के नहीं- युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराने के दिन नहीं हैं। युवा सत्ता पार्टी की जय-जयकार करेंगे और बड़े आराम से पकौड़े तलेंगे। खाओ जिसको जितना खाना हो। ये किसानों की आत्महत्याओं के दिन हैं। हमारे भाईचारे को खत्म करने के दिन हैं। ये बलात्कार का जलवा दिखाने के दिन हैं। इस देश का नागरिक तो केवल प्रार्थना के शिल्प में है, वह बस कीर्तन-भजन कर रहा है।